कम्बुज देश कम्बोडिया का इतिहास


कम्बुज देश कम्बोडिया का इतिहास

हिंद-चीन का प्राचीन हिंदू उपनिवेश जिसे कम्बोडिया कहा जाता है इसकी स्थापना 7वीं शती के पश्चात् हुई थी और तत्पश्चात् 700 वर्षों तक कम्बुज के वैभव तथा ऐश्वर्य का युग रहा। कम्बोडिया की एक प्राचीन लोककथा में आर्य देश या भारत के राजा कम्बु स्वायंभुव द्वारा कम्बुज (कम्बु के वंश) राज्य की स्थापना का वर्णन है। यहाँ का सर्वप्रथम ऐतिहासिक राजा श्रुतवर्मन् था जिसके इस देश को फूनान के शासन से मुक्त करके एक स्वंतत्र राज्य स्थापित किया। यहाँ की तत्कालीन राजधानी श्रेष्ठपुर में थी जिसका नामकरण कम्बुज के द्वितीय राजा श्रेष्ठवर्मन् के नाम पर हुआ था। इसकी स्थिति वर्तमान लाओस में वाटफू पहाड़ी के परिवर्ती प्रदेश में थी। इस पहाड़ी पर, जिसका प्राचीन नाम लिंग पर्वत था, भद्रेश्वर शिव का मंदिर स्थित था। ये कम्बुज नरेशों के इष्टदेव थे।

कम्बोडिया का प्राचीन संस्कृत नाम कम्बोज अथवा कम्बुज था। भूतपूर्व इंडोचीन प्रायद्वीप में सर्वप्राचीन भारतीय उपनिवेश की स्थापना फूनान प्रदेश में प्रथम शती ई. के लगभग हुई थी। लगभग 600 वर्षों तक फूनान ने इस प्रदेश में हिंदू संस्कृति का प्रचार एवं प्रसार करने में महत्वपूर्ण योग दिया। तत्पश्चात्‌ इस क्षेत्र में कम्बुज या कम्बोज का महान्‌ राज्य स्थापित हुआ जिसके अद्भुत ऐश्वर्य की गौरवपूर्ण परंपरा 14वीं सदी ई. तक चलती रही। इस प्राचीन वैभव के अवशेष आज भी अंग्कोरवात, अंग्कोरथोम नामक स्थानों में वर्तमान हैं।

कम्बोज की प्राचीन दंतकथाओं के अनुसार इस उपनिवेश की नींव 'आर्यदेश' के राजा कंबु स्वयांभुव ने डाली थी। वह भगवान्‌ शिव की प्रेरणा से कम्बोज देश में आए और यहाँ बसी हुई नाग जाति के राजा की सहायता से उन्होंने इस जंगली मरुस्थल में एक नया राज्य बसाया जो नागराज की अद्भुत जादूगरी से हरे भरे, सुंदर प्रदेश में परिणत हो गया। कंबु ने नागराज की कन्या मेरा से विवाह कर लिया और कम्बुज राजवंश की नींव डाली। यह भी संभव है कि भारतीय कम्बोज (कश्मीर का राजौरी जिला तथा संवर्ती प्रदेश-द्र. 'कम्बोज') से भी इंडोचीन में स्थित इस उपनिवेश का संबंध रहा हो। तीसरी शती ई. में भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर बसनेवो मुरुंडों का एक राजदूत फूनान पहुँचा था और संभवत: कम्बोज के घोड़े अपने साथ वहाँ लाया था। कम्बोज के प्रथम ऐतिहासिक राजवंश का संस्थापक श्रुतवर्मन था जिसने कम्बोज देश को फूनान की अधीनता से मुक्त किया। इसके पुत्र श्रेष्ठवर्मन ने अपने नाम पर श्रेष्ठपुर नामक राजधानी बसाई जिसके खंडहर लाओस के वाटफू पहाड़ी (लिंगपर्वत) के पास स्थित हैं। तत्पश्चात्‌ भववर्मन ने, जिसका संबंध फूनान और कम्बोज दोनों ही राजवंशों से था, एक नया वंश (ख्मेर) चलाया और अपने ही नाम भवपुर नामक राजधानी बसाई। भववर्मन तथा इसके भाई महेंद्रवर्मन के समय से कम्बोज का विकासयुग प्रारंभ होता है। फूनान का पुराना राज्य अब जीर्णशीर्ण हो चुका था और शीघ्र ही इस नए दुर्घर्ष साम्राज्य में विलीन हो गया। महेंद्रवर्मन की मृत्यु के पश्चात्‌ उनका पुत्र ईशानवर्मन गद्दी पर बैठा। इस प्रतापी राजा ने कम्बोज राज्य की सीमाओं का दूर-दूर तक विस्तार किया। उसने भारत और चंपा के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए और ईशानपुर नाम की एक नई राजधानी का निर्माण किया। ईशानवर्मन ने चंपा के राजा जगद्धर्म को अपनी पुत्री ब्याही थी जिसका पुत्र प्रकाशधर्म अपने पिता की मृत्यु के पश्चात्‌ चंपा का राजा हुआ। इससे प्रतीत होता है कि चंपा इस समय कम्बोज के राजनीतिक प्रभाव के अंतर्गत था। ईशानवर्मन के बाद भववर्मन्‌ द्वितीय और जयवर्मन्‌ प्रथम कम्बोज नरेशों के नाम मिलते हैं। जयवर्मन्‌ के पश्चात्‌ 674 ई. में इस राजवंश का अंत हो गया। कुछ ही समय के उपरांत कम्बोज की शक्ति क्षीण होने लगी और धीरे-धीरे 8वीं सदी ई. में जावा के शैलेंद्र राजाओं का कम्बोज देश पर आधिपतय स्थापित हो गया। 8वीं सदी ई. का कम्बोज इतिहास अधिक स्पष्ट नहीं है किंतु 9वीं सदी का आरंभ होते ही इस प्राचीन साम्राज्य की शक्ति मानों पुन: जीवित हो उठी। इसका श्रेय जयवर्मन्‌ द्वितीय (802-854 ई.) को दिया जाता है। उसने अंगकोर वंश की नींव डाली और कम्बोज को जावा की अधीनता से मुक्त किया। उसने संभवत: भारत से हिरण्यदास नामक ब्राह्मण को बुलवाकर अपने राज्य की सुरक्षा के लिए तांत्रिक क्रियाएँ करवाईं। इस विद्वान्‌ ब्राह्मण ने देवराज नामक संप्रदाय की स्थापना की जो शीघ्र ही कम्बोज का राजधर्म बन गया। जयवर्मन्‌ ने अपनी राजधानी क्रमश: कुटी, हरिहरालय और अमरेंद्रपुर नामक नगरों में बनाई जिससे स्पष्ट है कि वर्तमान कम्बोडिया का प्राय: समस्त क्षेत्र उसके अधीन था और राज्य की शक्ति का केंद्र धीरे-धीरे पूर्व से पश्चिम की ओर बढ़ता हुआ अंतत: अंग्कोर के प्रदेश में स्थापित हो गया था।

जयवर्मन्‌ द्वितीय को अपने समय में कम्बुजराजेंद्र और उसकी महरानी को कम्बुजराजलक्ष्मी नाम से अभिहित किया जाता था। इसी समय से कम्बोडिया के प्राचीन नाम कम्बुज या कम्बोज का विदेशी लेखकों ने भी प्रयोग करना प्रारंभ कर दिया था। जयवर्मन्‌ द्वितीय के पश्चात्‌ भी कम्बोज के साम्राज्य की निरंतर उन्नति और वृद्धि होती गई और कुछ ही समय के बाद समस्त इंडोचीन प्रायद्वीप में कम्बोज साम्राज्य का विस्तार हो गया। महाराज इंद्रवर्मन्‌ ने अनेक मंदिरों और तड़ागों का निर्माण करवाया। यशोवर्मन्‌ (889-908 ई.) हिंदू शास्त्रों और संस्कृत काव्यों का ज्ञाता था और उसने अनेक विद्वानों को राजश्रय दिया। उसके समय के अनेक सुंदर संस्कृत अभिलेख प्राप्य हैं। इस काल में हिंदू धर्म, साहित्य और काल की अभूतपूर्व प्रगति हुई। यशोवर्मन्‌ ने कंबुपुरी या यशोधरपुर नाम की नई राजधानी बसाई। धर्म और संस्कृति का विशाल केंद्र अंग्कोर थोम (द्र. 'अंग्कोर थोम' लेख) भी इसी नगरी की शोभा बढ़ाता था। 'अंग्कोर संस्कृति' का स्वर्णकाल इसी समय से ही प्रांरभ होता है। 944 ई. में कम्बोज का राजा राजेंद्रवर्मन्‌ था जिसके समय के कई बृहद् अभिलेख सुंदर संस्कृत काव्यशैली में लिखे मिलते हैं। 1001 ई. तक का समय कम्बोज के इतिहास में महत्वपूर्ण है क्योंकि इस काल में कम्बोज की सीमाएँ चीन के दक्षिणी भाग छूती थीं, लाओस उसके अंतर्गत था और उसका राजनीतिक प्रभाव स्याम और उत्तरी मलाया तक फैला हुआ था।

सूर्यवर्मन्‌ प्रथम (मृत्यु 1049 ई.) ने प्राय: समस्त स्याम पर कम्बोज का आधिपत्य स्थापित कर दिया और दक्षिण ब्रह्मदेश पर भी आक्रमण किया। वह साहित्य, न्याय और व्याकरण का पंडित था तथा स्वयं बौद्ध होते हुए भी शैव और वैष्णव धर्मों का प्रेमी और संरक्षक था। उसने राज्यासीन होने के समय देश में चले हुए गृहयुद्ध को समाप्त कर राज्य की स्थिति को पुन: सुदृढ़ करने का प्रयत्न किया। उत्तरी चंपा को जीतकर सूर्यवर्मन्‌ ने उसे कम्बोज का करद राज्य बना लिया किंतु शीघ्र ही दक्षिण चंपा के राजा जयहरि वर्मन्‌ से हार माननी पड़ी। इस समय कम्बोज में गृहयुद्धों और पड़ोसी देशों के साथ अनबन के कारण काफी अशांति रही।

जयवर्मन्‌ सप्तम (अभिषेक 1181) के राज्यकाल में पुन: एक बार कम्बोज की प्राचीन यश:पताका फहराने लगी। उसने एक विशाल सेना बनाई जिसमें स्याम और ब्रह्मदेश के सैनिक भी सम्मिलित थे। जयवर्मन्‌ ने अनाम पर आक्रमण कर उसे जीतने का भी प्रयास किया किंतु निरंतर युद्धों के कारण शनै: शनै: कम्बोज की सैनिक शक्ति का ्ह्रास होने लगा, यहाँ तक कि 1220 ई. में कम्बोजों को चंपा से हटना पड़ा। किंतु फिर भी जयवर्मन्‌ सप्तम की गणना कम्बोज के महान्‌ राज्यनिर्माताओं में की जाती है क्योंक उसमे समय में कम्बोज के साम्राज्य का विस्तार अपनीचरम सीमा पर पहुँचा हुआ था। जयवर्मन्‌ सप्तम ने अपनी नई राजधानी वर्तमान अंग्कोरथोम में बनाई थी। इसके खंडहर आज भी संसार के प्रसिद्ध प्राचीन अवशेषों में गिने जाते हैं। नगर के चतुर्दिक्‌ एक ऊँचा परकोटा था और 110 गज चौड़ी एक परिखा थी। इसकी लंबाई साढ़े आठ मील के लगभग थी। नगर के परकोटे के पाँच सिंहद्वार थे जिनसे पाँच विशाल राजपथ (100 फुट चौड़े, 1 मील लंबे) नगर के अंदर जाते थे। ये राजपथ, बेयोन के विराट् हिंदू मंदिर के पास मिलते थे, जो नगर के मध्य में स्थित था। मंदिर में 66,625 व्यक्ति नियुक्त थे और इसके व्यय के लिए 3,400 ग्रामों की आय लगी हुई थी। इस समय के एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि कम्बोज में 789 मंदिर तथा 102 चिकित्सालय थे और 121 वाहनी (विश्राम) गृह थे।

जयवर्मन्‌ सप्तम के पश्चात्‌ कम्बोज के इतिहास के अनेक स्थल अधिक स्पष्ट नहीं हैं। 13वीं सदी में कम्बोज में सुदृढ़ राजनीतिक शक्ति का अभाव था। कुछ इतिहासलेखकों के अनुसार कम्बोज ने 13वीं सदी के अंतिम चरण में चीन के सम्राट् कुबले खाँ का आधिपत्य मानने से इनकार कर दिया था। 1296 ई. में चीन से एक दूतमंडल अंग्कोरथोम आया था जिसके एक सदस्य शू-तान-कुआन ने तत्कालीन कम्बोज के विषय में विस्तृत तथा मनोरंजक वृत्तांत लिखा है जिसका अनुवाद फ्रांसीसी भाषा में 1902 ई. में हुआ था। 14वीं सदी में कम्बोज के पड़ोसी राज्यों में नई राजनीतिक शक्ति का उदय हो रहा था तथा स्याम और चंपा के थाई लोग कम्बोज की ओर बढ़ने का निरंतर प्रयास कर रहे थे। परिणाम यह हुआ कि कम्बोज पर दो ओर से भारी दबाव पड़ने लगा और वह इन दोनों देशों की चक्की के पाटों के बीच पिसने लगा। धीरे-धीरे कम्बोज की प्राचीन महत्ता समाप्त हो गई और अब यह देश इंडोचीन का एक साधारण पिछड़ा हुआ प्रदेश बनकर रह गया। 19वीं सदी में फ्रांसीसी का प्रभाव इंडोचीन में बढ़ चला था; वैसे, वे 16वीं सदी में ही इस प्रायद्वीप में आ गए थे और अपनी शक्ति बढ़ाने के अवसर की ताक में थे। वह अवसर अब और 1854 ई. में कम्बोज के निर्बल राजा अंकडुओंग ने अपना देश फ्रांसीसियों के हाथों सौंप दिया। नोरदम (नरोत्तम) प्रथम (1858-1904) ने 11 अगस्त, 1863 ई. को इस समझौते को पक्का कर दिया और अगले 80 वर्षों तक कम्बोज या कम्बोडिया फ्रेंच-इंडोचीन का एक भाग बना रहा। (कम्बोडिया, फ्रेंच का रूपांतर है। फ्रेंच नाम कम्बोज या कम्बुजिय से बना है।) 1904-41 में स्याम और फ्रांसीसियों के बीच होनेवाले युद्ध में कम्बोडिया का कुछ प्रदेश स्याम को दे दिया गया किंतु द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात्‌ 1945 ई. में यह भाग उसे पुन: प्राप्त हो गया। इस समय कम्बोडिया में स्वतंत्रता आंदोलन भी चल रहा था जिसके परिणामस्वरूप फ्रांस ने कम्बोडिया को एक नया संविधान प्रदान किया (मई 6, 1947)। किंतु इससे वहाँ के राष्ट्रप्रेमियों को संतोष न हुआ और उन्होंने 1949 ई. (8 नवंबर) में फ्रांसीसियों को एक नए समणैते पर हस्ताक्षर करने पर विवश कर दिया जिससे उन्होंने कम्बोडिया की स्वतंत्र राजनीतिक सत्ता को स्वीकार कर लिया, किंतु अब भी देश को फ्रेंच यूनियन के अंतर्गत ही रखा गया था। इसके विरुद्ध कम्बोडिया के प्रभावशाली राजा नोरदम सिंहानुक ने अपना राष्ट्रीय आंदोलन जारी रखा। इनके प्रयत्न से कम्बोडिया शीघ्र ही स्वतंत्र राष्ट्र बन गया और ये अपने देश के प्रथम प्रधान मंत्री चुने गए।

धर्म, भाषा, सामाजिक जीवन

कम्बोज वास्तविक अर्थ में भारतीय उपनिवेश था। वहाँ के निवासियों का धर्म, उनकी संस्कृति एवं सभ्यता, साहित्यिक परंपराएँ, वास्तुकला और भाषा-सभी पर भारतीयता की अमिट छाप थी जिसके दर्शन आज भी कम्बोज के दर्शक को अनायास ही हो जाते हैं। हिंदू धर्म और वैष्णव संप्रदाय और तत्पश्चात्‌ (1000 ई. के बाद) बौद्ध धर्म कम्बोज के राजधर्म थे और यहाँ के अनेक संस्कृत अभिलेखों को उनकी धार्मिक तथा पौराणिक सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के कारण भारतीय अभिलेखों से अलग करना कठिन ही जान पड़ेगा। उदाहरण के लिए राजेंद्रवर्मन्‌ के एक विशाल अभिलेख का केवल एक अंश यहाँ प्रस्तुत है जिसमें शिव की वंदना की गई है:

रूपं यस्य नवेन्दुमंडितशिखं त्रय्‌या: प्रतीतं पर
बीजं ब्रह्महरीश्वरोदयकरं भिन्नं कलाभिस्त्रिधा।
साक्षारदक्षरमामनन्ति मुनयो योगोधिगम्यं नमस्‌
संसिद्ध्यै प्रणवात्मने भगवते तस्मै शिवायास्तु वम्‌।।

पुराने अरब पर्यटकों ने कम्बोज को हिंदू देश के नाम से ठीक ही अभिहित किया। कम्बुज की राजभाषा प्राचीन काल में संस्कृत थी, उसका स्थान धीरे-धीरे बौद्ध धर्म के प्रचार के कारण पाली ने ले लिया और आज भी यह धार्मिक क्षेत्र में यहाँ की मुख्य भाषा बनी हुई है। कम्बुज भाषा में संस्कृत के हजारों शब्द अपने कम्बुजी या ख्मेर रूप में आज भी पाए जाते हैं (जैसे-तेप्‌दा उ देवता, शात्स उ शासन, सुओर उ स्वर्ग, फीमेअन उ विमान)। ख्‌मेर लिपि दक्षिणी भारत की पल्लव और पूर्वी चालुक्य लिपियों के मेल से बनी है। कम्बोज की वास्तुकला, मूर्तिकला तथा चित्रकला पर भारतीय प्रभाव स्पष्ट है। अंग्कोरथोम का बेयोन मंदिर दक्षिण भारत के मंदिरों से बहुत मिलता-जुलता है। इसके शिखर में भी भारतीय मंदिरों के शिखरों की स्पष्ट झलक मिलती है। इस मंदिर और ऐलोरा के कैलास मंदिर के कलातत्व, विशेषत: मूर्तिकारी तथा आलेख्य विषयों और दृश्यों में अद्भुत साम्य है।

कम्बोज की सामाजिक दशा का सुंदर चित्रण, शू-तान-कुतान के वर्णन (13वीं सदी का अंत) इस प्रकार है-

विद्वानों को यहाँ पंकि (पंडित), भिक्षुओं को शू-कू (भिक्षु) और ब्राह्मणों को पा-शो-वेई (पाशुपत) कहा जाता है। पंडित अपने कंठ में श्वेत धागा (यज्ञोपवीत) डाले रहते हैं, जिसे वे कभी नहीं हटाते। भिक्षु लोग सिर मुड़ाते और पीत वस्त्र पहनते हैं। वे मांस मछली खाते हैं पर मद्य नहीं पीते। उनकी पुस्तकें तालपत्रों पर लिखी जाती हैं। बौद्ध भिक्षुणियाँ यहाँ नहीं है। पाशुपत अपने केशों को लाल या सफेद वस्त्रों से ढके रहते हैं। कम्बोज के सामान्य जन श्याम रंग के तथा हृष्टपुष्ट हैं। राजपरिवार की स्त्रियाँ गौर वर्ण हैं। सभी लोग कटि तक शरीर विवस्त्र रखते हैं और नंगे पाँव घूमते हैं। राजा पटरानी के साथ झरोखे में बैठकर प्रजा को दर्शन देता है।

लिखने के लिए कृष्ण मृग काचमड़ा भी काम में आता है। लोग स्नान के बहुत प्रेमी हैं। यहाँ स्त्रियाँ व्यापार का काम भी करती हैं। गेहूँ, हल्दी, चीनी, रेशम के कपड़े, राँगा, चीनी बर्तन कागज आदि यहाँ व्यापार की मुख्य वस्तुएँ हैं।

गाँवों में प्रबंध करने के लिए एक मुखिया या मयिची रहता है। सड़कों पर यात्रियों के विश्राम करने के लिए आवास बने हुए हैं। (वि.कु.मा.)

कम्बोडिया-कम्बोज का अर्वाचीन नाम है। यह हिंद चीन प्रायद्वीप का एक देश है जो सन्‌ 1955 ई. में फ्रांसीसी आधिपत्य से मुक्त हुआ है। 19वीं शताब्दी के पूर्व यह प्रदेश ख़्मेर राज्य का अंग था किंतु 1863 ई. में फ्रांसीसियों के आधिपत्य में आ गया। द्वितीय विश्वयुद्ध में कम्बोडिया पर जापान का अधिकार था।

कम्बोडिया का क्षेत्रफल 1,81,000 वर्ग मील है। इसकी पश्चिमी और उत्तरी सीमा पर स्याम तथा लाओ और पूर्वी सीमा पर दक्षिणी वियतनाम देश हैं। दक्षिण-पश्चिम भाग स्याम की खाड़ी का तट है। कम्बोडिया तश्तरी के आकर की एक घाटी है जिसे चारों ओर से पर्वत घेरे हुए हैं। घाटी में उत्तर से दक्षिण की ओर मीकांग नदी बहती है। घाटी के पश्चिमी भाग में तांगले नामक एक छिछली और विस्तृत झील है जो उदाँग नदी द्वारा मीकांग से जुड़ी हुई है।

कम्बोडिया की उपजाऊ मिट्टी और मौसमी जलवायु में चावल प्रचुर परिमाण में होता है। अब भी विस्तृत भूक्षेत्र श्रमिकों के अभाव में कृषिविहीन पड़े हैं। यहाँ की अन्य प्रमुख फसलें तुबाकू, कहवा, नील और रबर हैं। पशुपालन का व्यवसाय विकासोन्मुख है। पर्याप्त जनसंख्या मछली पकड़कर अपनी जीविका अर्जित करती है। चावल और मछली कम्बोडिया की प्रमुख निर्यात की वस्तुएँ हैं। इस देश का एक विस्तृत भाग बहुमूल्य वनों से आच्छादित है। मीकांग और टोनलेसाप के संगम पर स्थित प्नॉम पेन कम्बोडिया की राजधानी है। बड़े-बड़े जलयान इस नगर तक आते हैं। यह नगर कम्बोडिया की विभिन्न भागों से सड़कों द्वारा जुड़ा है।[2]


टीका टिप्पणी और संदर्भ

  • ऐतिहासिक स्थानावली | पृष्ठ संख्या= 122-123| विजयेन्द्र कुमार माथुर | वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग | मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार
  1. बसाक के निकट
  2. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 2 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 357 |

Deepak Kamboj

Deepak Kamboj started and conceptualized the powerful interactive platform - KambojSociety.com in September 2002, which today is the biggest and most popular online community portal for Kambojas in the world. He was inspired by the social and community work carried out by his father Shri Nanak Chand Kamboj. He has done research on the history, social aspects, political growth and economical situation of the Kamboj community. Deepak Kamboj is an author of various articles about the history of Kamboj community and people.